फरीदाबाद में रावण के साथ-साथ कोरोना को भी जलाकर दशहरा मनाएँगे शहरवासी

News24NCR/Faridabad: कोरोना महामारी से लोगों की जीवन शैली में तो बदलाव आया ही है, साथ में त्योहार और मेलों पर भी इसका असर देखने को मिल रहा है। साल के सबसे बड़े त्योहार में से एक विजय दशमी पर्व भी इस बार ठंडा ही रहने वाला है। करीब सात माह से कोरोना संक्रमण काल के बीच जीवन बिता रहे लोग इस बार रावण के साथ कोरोना के पुतले को भी जलाएंगे। इसके लिए कारीगर के पास लोग कोरोना के पुतले बनाने का ऑर्डर दे रहे हैं। प्रदूषण को देखते हुए इस बार पुतलों में पटाखों का भी इस्तेमाल नहीं किया गया है।विज्ञापन

कोरोना ने इस बार रावण की लंबाई घटा दी है। इस बार लोगों की जेब तंग होने के कारण बड़े पुतलों की मांग न के बराबर है। कुछ लोग तो इस बार रावण की जगह बुराई के प्रतीक के रूप में कोरोना के पुतले की मांग कर रहे हैं। आलम यह है कि 60 से 80 फीट तक विशालकाय दिखने वाले रावण के पुतले का कद अब इंसानों से भी कम हो गया है।
तीन पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने वाले शकील खान का कहना है कि पिता व दादा रमजान अली व रहमत खान के साथ वह भी कई वर्षों से पुतले बनाने का काम करते आ रहे हैं। अब सारा काम वह खुद ही संभालते हैं। जब से होश संभाला है रावण के पुतलों का कद बढ़ता ही जा रहा था, लेकिन इस साल यह पहली बार है कि रावण के पुतले इंसान से भी कम कद के बनकर रह गए हैं।


कीमत भी पिछले साल के मुकाबले आधी
उन्होंने बताया कि हर साल दशहरा कमेटी के लोग तो रावण बनवाते ही थे। इसके साथ साथ गली मोहल्ले व सेक्टर के लोग भी रावण के बीस फीट व 25 फीट के पुतले खूब बनवाते थे। इस बार दशहरा कमेटी के अलावा केवल चार से साढ़े पांच फीट के पुतले ही लोग बनवा रहे हैं। इस बार दाम भी पहले के मुकाबले आधे रह गए हैं। पहले छह फीट के रावण का पुतला 3500 से चार हजार तक बिक जाता था जो अब केवल डेढ़ से दो हजार में बेच रहे हैं।


कोरोना ने घटाई कमाई
रहमान बताते हैं कि इस बार जहां कोरोना ने उनकी कमाई घटाई है, वहीं दूसरी तरफ कोरोना के पुतलों की मांग भी आ रही है। कुछ लोग साधारण पुतला बनवाकर उसके ऊपर फ्लैक्स पर कोरोना की आकृति प्रिंट कराकर भी लगा रहे हैं। कोरोना की शक्ल बनाने के लिए एक गोलाकार आकृति को बनाकर उनमें से कुछ सींक निकालनी होती हैं जिसमें समय लग जाता है। इसलिए लोग प्रतीकात्मक ही सही, लेकिन कोरोना महामारी के पुतले बनवा रहे हैं।

रहमान अली बताते हैं कि उनके परिवार से करीब दस लोग इस काम में जुटे हुए हैं, लेकिन कमाई के नाम पर इस बार खर्च निकालना भी मुश्किल है। प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने प्लास्टिक का कोई इस्तेमाल पुतलों में नही किया है। पुतलों में किसी तरह के कोई पटाखे भी नही लगाए जा रहे हैं।