कुदरत कि पैदा की हुई सब्ज़ी या फल का कोई धर्म नहीं होता, तो समाज के दुश्मन क्या समाज ने खुद पैदा किए हैं?

News24NCR/Delhi: बीते दिनों से सोशल मीडिया पर जो हिन्दू मुस्लिम का जहर फैलाया गया उस का दुष्प्रभाव गरीब मजदूर पर पड़ा। चाहे वो मज़दूर हिन्दु धर्म का रहा हो या मुस्लिम धर्म का। अनेकों जगहों पर मजहबी मानसिकता कि वजह से गरीब मजदूरों का आर्थिक बहिष्कार किया गया।

वास्तव में तो गरीब-मजदूरों का कोई धर्म- मज़हब होता ही नही, वो उन परिंदों की तरह होते हैं जो बिना मंदिर- मस्जिद का भेद किये वहीं चले जाते हैं जंहा उन्हें दाना मिलता है।

सोशल मीडिया पर वायरल इस तस्वीर को देखिए क्या आपको इस तस्वीर में जो लिखा है उसे देख कर दुख नही होता? याद कीजिये कि पहले कब आपने ऐसी मुनादी वाली तस्वीर देखी थी? या ऐसा देखा होगा कि किसी मुसलमान ने अपनी रेहड़ी लिखा हो कि वह सब्जी/ समान बेचते हुए हिन्दू मोहल्ले में ‘सेफ’ या किसी हिन्दू को मुस्लिम मोहल्ले में जा के अपना सामान बेचते हुए उसे यह लिखना पड़ा ही कि वह ‘हिन्दू ‘ है और सेफ है?

कभी नही! अपने पहले कभी ऐसी हिन्दू मुस्लिम गरीब मजदूरों में भेद करने वाली तस्वीरों को नही देखा होगा और न ही कभी ऐसा महसूस ही किया होगा। शायद ही पहले कभी आपने गली में, बाजार में सब्जी-फल खरीदते हुए बेचने वाले का धर्म पूछा होगा। शायद ही कभी आपने घर में पेंट करवाने से पहले पेंटर्स का धर्म देखा होगा! ऐसे बहुत से उदहारण आपको मिल जायेंगे।

कभी किसी गरीब मजदूर से पूछिए की क्या पहले कभी उसे किसी मुस्लिम, हिन्दू मोहल्ले में फल-सब्जी बेचते हुए, मजदूरी करते हूए उससे उसका धर्म पूछा गया था? शायद नही! ऐसा नही होता था। लोग मजदूर से उसका काम और मेहनताना पूछते थे, सब्जी-फल किस भाव के हैं ये पूछते थे। उससे उसका धर्म नही पूछते थे।

देश क्या बनता जा रहा है, सोशल मीडिया कि इस आँधी में युवा देश को कहाँ ले जा रहा है? ऐसी तस्वीरें समाज को विचलित और दुखी करती हैं! क्या आपको भी?