अरावली स्थित मांगर बनी की सुंदरता पर मोहित होकर श्रीलंका से भारत पहुँची शर्मिली नवरंग चिड़िया

  • दो हजार किलोमीटर का सफर तय कर मांगर बनी पहुंचे नवरंग चिड़िया के जोड़े

News24NCR/Faridabad: दक्षिण भारत व श्रीलंका के मूल निवासी पक्षी इंडियन पिट्टा मांगर बनी की सुंदरता पर मोहित हो गए हैं। इतने कि हर साल करीब दो हजार किलोमीटर का सफर तय करके यहां पहुंचते हैं। हर बार इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है। इस बार इस चिड़िया के छह जोड़ों की साइटिंग (दिखाई देना) मांगर बनी में हो रही है। अपने नौ रंगों के कारण यह पक्षी नवरंग चिड़िया के नाम से मशहूर है। यह जितनी खूबसूरत है, उतनी ही शर्मिली भी। अक्सर घने पेड़ों की टहनियों में छिपकर रहना पसंद करती है।

अरावली में जंगल, जीवों और पक्षियों पर शोध करने वाले सुनील हरसाना बताते हैं कि दक्षिण भारत व श्रीलंका के वन क्षेत्र नवरंग चिड़िया के मूल निवास स्थान हैं। अपना वंश बढ़ाने के लिए मई-जून में ये पक्षी हिमालय, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, नेपाल व पश्चिमी पाकिस्तान के वन क्षेत्र में शरण लेते हैं। अक्टूबर तक इनके बच्चे बड़े होकर उड़ने लायक हो जाते हैं तो ये वापस मूल निवास लौट जाते हैं। पिछले पांच-छह साल से मांगर बनी में भी इन पक्षियों की साइटिंग होनी शुरू हुई है। अन्य जगहों की तरह यहां भी ये मई-जून में पहुंचते हैं और अक्टूबर में बच्चों को लेकर वापस लौटते हैं।

अभी तक इन पक्षियाें के मांगर बनी पहुंचने पर कोई शोध तो नहीं हुआ, मगर यह तय है कि इन्हें यहां का माहौल नेस्टिंग (घोंसला बनाकर अंडे देने व बच्चे बड़े करने की प्रक्रिया) के अनुकूल लगा, इसलिए अब ये नियमित रूप से यहां पहुंचना शुरू कर दिया है। मांगर बनी के अलावा पिछले तीन साल से भौंडसी गुरुग्राम में भी दिखाई दे रहे हैं। उत्तर भारत में केवल इन्हीं दो जगहों पर इन पक्षियों की साइटिंग होती है।

पक्षी प्रेमियों के लिए रोमांचक है नवरंग चिड़िया को देखना: नवरंग चिड़िया काे देखना व अपने कैमरे में कैद करना पक्षी प्रेमियों के राेमांचक क्षण होता है। सुनील हरसाना कहते हैं कि अपने खास व्यवहार और सुंदरता के कारण पिट्टा या नवरंग मांगर बनी की शान है। यह चिड़िया अपनी विशेष आवाज के माध्यम से ही अपने होने का अहसास करा देती है। आसपास के इलाके से भारी संख्या में पक्षी प्रेमी नवरंग चिड़िया को देखने के लिए मांगर बनी पहुंचते हैं।

हरसाना यहां साल 2015 से गांव व आसपास के बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के लिए ईको क्लब भी चलाते हैं, उनके अनुसार हर साल 25 मई के बाद ईको क्लब में बच्चों की संख्या में इजाफा हो जाता है। पिट्टा आने की सूचना मिलते ही नए बच्चे भी ईको क्लब में आना शुरू कर देते हैं। पिट्टा को देखने के बाद गर्व और कुदरत के प्रति कृतज्ञता का जो भाव उनके चेहरे पर दिखाई देता है उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।